रविवार, 28 अगस्त 2022

ज़रा रहने दो अपने दर पे हम ख़ाना-ब-दोशों को 

मुसाफ़िर जिस जगह आराम पाते हैं ठहरते हैं

शुक्रवार, 26 अगस्त 2022

तुम होते तो सम्भालते मुझे 

तुम्हारा ये हक़ हक़ीम खा रहे हैं...
रंजिश ही सही दिल ही दुखाने के लिए आ 

आ फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ 

कुछ तो मिरे पिंदार-ए-मोहब्बत का भरम रख 

तू भी तो कभी मुझ को मनाने के लिए आ
उस शख्स से बस इतना सा ताल्लुक है ‘फ़राज़’

वो परेशां हो तो हमें नींद नहीं आती